Paper Title
विष्णु के द्वादश अवतार और जैविक-सांस्कृतिक विकास का तुलनात्मक अध्ययन
Abstract
भारतीय पौराणिक परंपरा में विष्णु के बारह अवतारों की अवधारणा को सामान्यतः धर्म की पुनर्स्थापना के लिए दैवी हस्तक्षेप के रूप में समझा जाता है। किंतु यदि इस अवधारणा का प्रतीकात्मक तथा अंतर्विषयी दृष्टिकोण से विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि इन अवतारों और जैविक तथा सांस्कृतिक विकास की विभिन्न अवस्थाओं के बीच आश्चर्यजनक समानताएँ विद्यमान हैं।
यह शोध-पत्र दशावतार परंपरा का अध्ययन उत्क्रांति के सिद्धांतों, विशेषकर चार्ल्स डार्विन द्वारा प्रतिपादित विकासवाद, सामाजिक-सांस्कृतिक विकास तथा “सनातन में विज्ञान” की अवधारणा के संदर्भ में करने का प्रयास करता है। अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि अवतारों का क्रम प्रतीकात्मक रूप से जलीय जीवन से प्रारंभ होकर क्रमशः स्थलीय जीवन, मानवीय सभ्यता और अंततः उच्च आध्यात्मिक चेतना की ओर अग्रसर विकास यात्रा का द्योतक है।
कुंजी शब्द: दशावतार, उत्क्रांति, सभ्यता, प्रतीकात्मकता, भारतीय दर्शन, सांस्कृतिक विकास।